Stress Jyada Ho To Kya Kare | स्ट्रेस तनाव ज्यादा हो तो क्या करें?
आमतौर पर रात में जब सब लोग सो जाते हैं, तब कुछ लोग जागते रहते हैं।
नींद नहीं आती क्योंकि दिमाग शांत नहीं होता। दिल में अजीब सी हलचल चलती रहती है। हर छोटी बात एक तूफान बन जाती है।
अगर ऐसा हो गया तो?
अगर मैं फेल हो गया तो?
अगर सब ने मुझे छोड़ दिया तो?
Stress jyada ho to kya kare – यह सवाल आज हर किसी के मन में उठता है। हमारी ज़िंदगी पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ हो गई है। सुबह से रात तक काम का दबाव, पढ़ाई का बोझ, रिश्तों की जिम्मेदारियाँ और लगातार बदलती परिस्थितियाँ हमें थका देती हैं। ऐसे में तनाव यानी स्ट्रेस एक आम समस्या बन चुका है। लेकिन अच्छी बात यह है कि तनाव को समझकर और सही तरीके अपनाकर इसे कम किया जा सकता है।
तनाव सिर्फ मन को ही नहीं बल्कि शरीर को भी प्रभावित करता है। सिरदर्द, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, और काम में ध्यान न लगना – ये सब स्ट्रेस के लक्षण हैं। अगर इन्हें समय पर न संभाला जाए तो यह हमारी productivity और खुशियों दोनों को छीन लेता है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि tanav kam karne ke upay क्या हैं, कौन से stress relief tips in Hindi आपके लिए मददगार हो सकते हैं, और कैसे छोटे-छोटे lifestyle changes आपके जीवन को हल्का और संतुलित बना सकते हैं।
यह लेख सिर्फ जानकारी देने के लिए नहीं है, बल्कि आपको यह एहसास दिलाने के लिए है कि आप अकेले नहीं हैं। हर इंसान कभी न कभी स्ट्रेस का सामना करता है, और सही तरीके अपनाकर इसे मैनेज करना बिल्कुल संभव है।
कई बार हम बाहर से बहुत सामान्य दिखते हैं। लेकिन अंदर एक ऐसा डर होता है जो किसी को दिखाई नहीं देता। वो डर जो बार-बार यह कहता है कि तू नाकाम हो जाएगा। वो चिंता जो हर खुशी को निगल जाती है और हर पल को बोझ बना देती है।
कभी सोचा है कि यह डर आता कहां से है?
हमारे बचपन से लेकर आज तक की हर असफलता, हर डांट, हर तुलना। इन सब ने हमारे मन में एक बीज बोया है। डर का बीज, चिंता का बीज जो धीरे-धीरे एक पेड़ बन गया जिसकी छाया में हम हर पल जीने की बजाय घुटघुट कर जीते हैं। पर क्या डर हकीकत है? या सिर्फ एक सोच, एक भ्रम जो हमारे दिमाग ने ही गढ़ा है। गौतम बुद्ध ने कहा था जिस तरह आग जलने से पहले ही उसके डर से जल नहीं सकती, उसी तरह चिंता करने से कोई समस्या हल नहीं होती बल्कि चिंता समाधान से तुम्हें और दूर कर देती है।
डर और चिंता यह इंसान के दिमाग की वह चाले हैं जो हमें रोकती हैं,कमजोर बनाती हैं। हमें हमारे ही भविष्य से डराने लगती हैं। जबकि भविष्य किसी ने देखा ही नहीं। एक रिसर्च बताती है कि जिन बातों की हम चिंता करते हैं उनमें से 85% बातें कभी होती ही नहीं और जो 15% होती भी हैं उनसे निपटने की हमारी ताकत हमारी सोच से कहीं ज्यादा होती है। फिर भी हम डरते हैं क्यों? क्योंकि हमारे दिमाग को आदत पड़ चुकी है बुरे की कल्पना करने की, हमेशा नेगेटिव सोचने की। हम अपने ही मन के बंद दरवाजे के पीछे कैद हो जाते हैं। बिना यह जाने कि दरवाजा कभी बंद था ही नहीं। हमने ही उसे खोलने की हिम्मत नहीं की।
हर बार जब आप किसी काम को करने से पहले डरते हैं तो असल में आप उस काम से नहीं उस अनजान परिणाम से डरते हैं-
लोग क्या कहेंगे?
मैं असफल हो गया तो मुझे रिजेक्ट कर दिया गया तो?
हम हर बात को इतना सोच लेते हैं कि वह एक छोटी सी रुकावट नहीं रहती। वो एक पहाड़ बन जाती है।
लेकिन सच्चाई यह है डर एक भावना है। कोई हकीकत नहीं। डर को खत्म करने का बस एक ही तरीका है। उसका सामना करना। जो डराता है उसी की आंखों में आंखें डाल कर देखो। धीरे-धीरे डर डरना बंद कर देता है। सोचो जब आप पहली बार पहली बार इंटरव्यू देने गए थे या किसी मंच पर बोले थे। कितना डर लगा था ना? लेकिन आज वो डर कहां है?
यही बात है। डर को समझो। उससे भागो मत। क्योंकि जितना भागोगे वो उतना पीछा करेगा और जितना पास जाओगे वो उतना छोटा लगता जाएगा। अब चिंता की बात करें। चिंता इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है जो दोस्त बनकर आता है। हमें लगता है कि चिंता करने से हम जिम्मेदार बनते हैं। पर असल में चिंता हमारे दिमाग को थका देती है। उसे बार-बार एक ही जगह दौड़ाती है। जहां ना कोई हल है ना कोई रास्ता। जो लोग हर समय चिंता में जीते हैं उनका दिमाग धीरे-धीरे डिसीजन लेना बंद कर देता है। क्रिएटिविटी मर जाती है। नए रास्तों की कल्पना मिट जाती है। और सबसे बड़ी बात वो इंसान हर पल में जीने की ताकत खो देता है। जैसे कोई बहुत पुराना कंप्यूटर जिसमें बहुत सारी फाइलें खुली हो और अब वो हैंग हो रहा हो। बस वैसे ही चिंता हमारे दिमाग को हैंग कर देती है।
तो फिर इससे बाहर कैसे निकला जाए?
मन की सफाई जरूरी है। हर दिन खुद से कहना मैं अपने डर को समझता हूं। उसे स्वीकार करता हूं और अब उससे आगे बढ़ रहा हूं। हर बार जब मन चिंता करने लगे गहरी सांस लो। मन को वर्तमान में लाओ। देखो क्या अभी कोई खतरा है? क्या अभी तुम सुरक्षित हो? तो फिर डर कैसा? डर भविष्य की कल्पना है। चिंता एक रुकावट है और समाधान वो तो तुम्हारे अभी में छिपा है। यही बात बुद्ध ने समझाई थी। भविष्य की चिंता छोड़ो। अतीत की ग्लानी छोड़ो। वर्तमान ही जीवन है। इसलिए आज हम इस blob लेख में उस यात्रा की शुरुआत करने जा रहे हैं जो आपको, आपके ही डर और चिंता से आजाद करेगी। एक ऐसी यात्रा जिसमें हर मोड़ पर हम जानेंगे-
डर से लड़ने की रणनीति क्या है?
दिमाग कैसे काम करता है? और
कैसे हम खुद को आंतरिक/ मानसिक शांति (Inner Peace) की तरफ ले जा सकते हैं?
यह सिर्फ शुरुआत है क्योंकि इसके बाद हम उन पांच लक्षणों पर बात करेंगे जो हर उस इंसान में पाए जाते हैं जो डर और चिंता को हराकर अपने जीवन को नई दिशा में मोड़ता है।
कभी आपने खुद से यह सवाल पूछा है मैं किस चीज से डर रहा हूं?
जो हुआ ही नहीं उससे डरना क्या यह समझदारी है?
हम में से ज्यादातर लोग हर दिन ऐसे डर के साथ जीते हैं जो सच में हुआ ही नहीं है। हम उस नौकरी का रिजल्ट आने से पहले ही चिंता में डूब जाते हैं। हम उस बात पर रातों की नींदें खो देते हैं जो किसी ने अभी कही भी नहीं। हम उस असफलता से डरने लगते हैं जो शायद कभी आए ही नहीं। पर क्या कभी आपने ठहर कर यह सोचा? यह डर हकीकत है या सिर्फ एक भ्रम।
डर असल में होता क्या है?
डर एक कल्पना है। एक विचार है, एक अनदेखा और अनका डरावना भविष्य जो शायद कभी आए ही ना। हमारा दिमाग जो हमें बचाने के लिए बना है वही दिमाग हमारे खिलाफ काम करने लगता है। क्योंकि डर पैदा होता है उस चीज से जिसे हमने देखा नहीं जाना नहीं समझा नहीं। डर अंधेरे जैसा होता है जो खुद कुछ नहीं होता। सिर्फ रोशनी की गैर मौजूदगी का नाम है और जब हम डरते हैं तो हमारा मन उस कहानी को बार-बार दोहराता है। जैसे कोई पुरानी फिल्म जो हर दिन दोबारा चलती है और हम उसका किरदार बनकर उसमें जीते हैं।
कभी सोचा है- आपके डर की जड़ में क्या है?
एक विचार एक क्या होगा अगर अगर मैं फेल हो गया तो अगर उसने मना कर दिया तो अगर सबने हंस दिया तो पर सच्चाई यह है कुछ भी हुआ नहीं है। यह सब सिर्फ आपके दिमाग में चल रही कहानी है। डर की जड़ कल्पना में है ना कि सच्चाई में। अब सोचिए आप एक बच्चे को देख रहे हैं जो अंधेरे कमरे में जाने से डर रहा है। वह कहता है वहां भूत है। आप मुस्कुराते हैं क्योंकि आपको पता है वहां कुछ नहीं है।
अब खुद से पूछिए-
क्या आप भी उस बच्चे जैसे नहीं हो गए हैं?
आप भी तो हर दिन उस अंधेरे में घुसने से डरते हैं जहां दरअसल कोई खतरा नहीं। डर को पहचानो उसे देखो। उसे समझो। जब भी कोई डर उठे उसे लिखो। पूछो खुद से। क्या यह डर तर्कसंगत है? क्या इसका कोई आधार है? क्या मैं आज अभी इस क्षण सुरक्षित हूं?
क्योंकि डर का इलाज उसके सामने खड़े होने में है। जब आप डर की आंखों में आंखें डालते हो तो वह खुद पिघलने लगता है। डर तब तक बड़ा लगता है जब तक आप उससे भागते रहते हो। पर जिस दिन आपने रुक कर उसे देखा उस दिन से डर की ताकत खत्म हो जाती है। बहुत से लोग सोचते हैं कि डर से बचना समझदारी है पर असल समझदारी डर को समझने में है। कामयाब लोग भी डरते हैं। फर्क बस इतना है वह डर के बावजूद आगे बढ़ते हैं। वह जानते हैं कि डर एक संकेत है कि वह कुछ बड़ा करने जा रहे हैं। डर का होना यह साबित करता है कि आप एक सुरक्षित घेरे से बाहर निकल रहे हो और यहीं से असली जिंदगी शुरू होती है।
अब सोचो अगर आप अपने डर से आज नहीं लड़े तो आप वही जिंदगी जीते रहोगे जो आपको अंदर से खाली करती है। आप वह कदम कभी नहीं उठाओगे जो आपकी जिंदगी को बदल सकते थे। आप सिर्फ दूसरों की कहानियां सुनते रहोगे लेकिन अपनी कहानी कभी नहीं बना पाओगे। इसलिए डर को बहाना मत बनने दो। डर को कारण बनाओ। आगे बढ़ने का, नया सीखने का, खुद को बदलने का। डर को अपना दुश्मन नहीं शिक्षक बनाओ। हर डर के पीछे एक सबक छुपा है। बस आपको उसे सुनने की हिम्मत चाहिए। और याद रखो डर की सबसे बड़ी ताकत यह है कि हम उसे छुपा लेते हैं। हम उसे स्वीकार ही नहीं करते। हम उसे दबा देते हैं। पर जो डर को स्वीकार कर लेता है वही उसे पार कर पाता है। यह दुनिया उन्हीं की कहानी याद रखती है जो डरे लेकिन रुके नहीं। जिन्होंने कांपते पैरों से पहला कदम बढ़ाया। जो अंदर से टूटा हुआ था लेकिन फिर भी मुस्कुराया। जो हारे थे लेकिन फिर भी उठे और जो डर से नहीं खुद से जीते।
इसलिए अगली बार जब कोई डर आपके दरवाजे पर दस्तक दे तो दरवाजा खोल देना और कहना मैं तुझसे डरता नहीं मैं तुझे जानता हूं। तू कोई राक्षस नहीं। तू तो बस मेरे दिमाग की एक परछाई है और अब मैं रोशनी में जीने वाला हूं। और जब आप इस डर को पहचान लेते हो, जब आप इसका सच देख लेते हो, तो फिर एक नई ताकत अंदर से उभरती है। शांति की ताकत।
और यही वह जगह है जहां से अगली बात शुरू होती है-
कभी आपने महसूस किया है कि जब आप किसी चिंता में डूबे होते हैं तो पूरा दिन उसी चिंता में बीत जाता है? सुबह उठते ही वही डर, वही उलझने, वही नकारात्मक विचार आपके दिमाग में गूंजने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे वह सोच इतनी बड़ी हो जाती है कि आप कुछ और सोच ही नहीं पाते। और तब लगता है जैसे सारी ऊर्जा, सारा ध्यान, उसी डर, उसी समस्या, उसी दर्द में चला गया। क्यों? क्योंकि जहां ध्यान जाता है ऊर्जा वहीं जाती है। आपने शायद अपने आप से यह शब्द कभी नहीं कहे होंगे। लेकिन आपका मन यह हर दिन दोहरा रहा होता है। मैं कितना परेशान हूं सब गड़बड़ हो जाएगा। मेरे पास रास्ता नहीं है। और यही दोहराव बन जाता है आपकी सच्चाई।
पर यही तो खेल है दिमाग का। वो जहां टिकेगा, आपकी पूरी चेतना, आपका पूरा अनुभव वहीं आकार लेने लगेगा। आप डर पर टिके रहो तो डर बढ़ेगा। आप समाधान पर टिके रहो तो रास्ता दिखने लगेगा। लेकिन फर्क यह है कि ज्यादातर लोग सिर्फ समस्या को पकड़ कर बैठ जाते हैं। वे हर बार यही सोचते हैं। मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? पर सवाल यह होना चाहिए। अब मैं क्या कर सकता हूं? कहानी वही है। लेकिन देखने का नजरिया बदलते ही पूरी जिंदगी बदल सकती है।
अब आइये, इसे एक कहानी के माध्यम से समझते हैं-
एक बार एक किसान के खेत में बहुत बड़ी आग लग गई। उसका सब कुछ जल गया। मेहनत फसल सपना। लोग उसके पास आए बोले अब क्या करेगा तू वो थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला अब मैं फिर से बीज बोऊंगा लोग हक्के बक्के रह गए उसे डर नहीं लगा हां लगा पर उसका ध्यान जल चुकी फसल पर नहीं अगली फसल पर था।
यही फर्क है। दर्द सबको होता है पर कौन उस दर्द में अटक जाता है और कौन उससे आगे बढ़ता है यह तय करता है- उसका फोकस।
जब भी कोई मुश्किल आती है तो हमारा दिमाग तुरंत खतरे पर ध्यान देना शुरू करता है। यह एक जैविक प्रतिक्रिया है। बचपन से ही हमारे दिमाग को सिखाया गया है कि जो चीज डरावनी है उसी पर ध्यान दो ताकि खुद को बचा सको। लेकिन अब जरूरत यह है कि हम उस ऑटोमेटिक सोच को बदलें। क्योंकि अब हमें जान बचाने से ज्यादा जिंदगी को समझने की जरूरत है।
अगर आप हर बार डर, गलती और चिंता पर ही ध्यान रखेंगे तो आपका दिमाग उसी डर का संसार बना देगा। और एक समय बाद आपको हर जगह बस डर ही दिखाई देगा। लोगों में, फैसलों में, खबरों में और खुद में। इसलिए जागो अपने ध्यान को पकड़ो उसे समझो क्योंकि जहां ध्यान टिकेगा वहीं आपकी कहानी बनेगी। आज अगर आप अपनी पूरी चेतना इस बात पर लगा दो कि मेरे पास हल है मुझे रास्ता मिलेगा तो आपका दिमाग वही रास्ता ढूंढना शुरू कर देगा।
विज्ञान (Science) भी यही कहता है हमारे मस्तिष्क में एक हिस्सा है जिसे कहते हैं रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (RAS)। यह हमारे ध्यान को फिल्टर करता है। अगर आप बार-बार किसी चीज के बारे में सोचते हैं, तो यह सिस्टम उसी से जुड़ी चीजों को आपकी दुनिया में ज्यादा दिखाना शुरू कर देता है। यानी अगर आप डर के बारे में सोचते हैं, तो डर बढ़ेगा और अगर आप समाधान के बारे में सोचते हैं तो हल सामने आने लगते हैं। आपके विचार बीज हैं और ध्यान उस बीज को पानी देने जैसा है। जो सोचोगे वह पनपेगा।अब सोचो आप किसको सींच रहे हो? डर को या समाधान को।
लोगों की सोच में फर्क यहीं से शुरू होता है। एक ही हालात में कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग निखर जाते हैं। टूटने वाला हमेशा यही कहता है कुछ नहीं हो सकता। निखरने वाला पूछता है क्या हो सकता है? हमारी ऊर्जा सीमित है। हर दिन उठते ही हमारे पास एक बैटरी होती है मानसिक ऊर्जा की। अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि उस बैटरी को डर की सोच में खत्म करोगे या समाधान की खोज में लगाओगे। आप जिस चीज पर ध्यान देते हो वह बड़ी होती जाती है। अगर आप हर दिन यह सोचते रहोगे कि मैं कुछ नहीं कर सकता तो एक दिन आप सच में कुछ नहीं कर पाओगे। पर अगर आप हर सुबह यह सोचो कि मैं कोशिश करूंगा चाहे जितनी छोटी हो तो वही छोटी कोशिश एक दिन बड़ा बदलाव लाएगी।
कभी अपने मन से कहिए मैं डर नहीं हूं। मैं रास्ता हूं। मैं रुकावट नहीं हूं। मैं जवाब हूं। मैं अंधेरा नहीं, मैं रोशनी हूं। और जैसे ही आप फोकस बदलते हैं, आपका जीवन बदलने लगता है क्योंकि आपका ध्यान ही वह चाबी है जो बंद दरवाजों को खोल सकती है। तो अगली बार जब कोई डर या चिंता आपके भीतर उगे तो खुद से यह पूछिए मैं किस चीज पर ध्यान दे रहा हूं? अगर वह जवाब आपको डराए तो तुरंत अपना फोकस बदलो क्योंकि डर में कुछ नहीं रखा। रास्ता तो वहां है जहां रोशनी है।
जब आप ध्यान से डर को हटाकर समाधान की ओर मोड़ते हो तो वहां एक नई शक्ति जागती है- धैर्य की शक्ति।
जब दिमाग परेशान हो, दिल घबराया हो और सोचें बेकाबू दौड़ रही हो, तब क्या करो? हर इंसान की जिंदगी में वह पल आता है जब सब कुछ धुंधला लगने लगता है। जैसे सांसे भी बोझ बन गई हो। आंखें खुली होती हैं। लेकिन ध्यान नहीं होता। हाथ काम कर रहे होते हैं। लेकिन मन कहीं और होता है। शरीर वर्तमान में होता है। पर आत्मा या तो बीते कल में फंसी होती है या आने वाले कल की चिंता में डूबी। और यही तो जड़ है चिंता की। वर्तमान को छोड़ देना। गौतम बुद्ध ने एक बहुत सीधी और गहरी बात कही थी। जो व्यक्ति वर्तमान में जीता है वही
सच्चा जीवन जीता है। बाकी सब तो भ्रम है, माया है।
अब सोचिए………
जब हम एक ठहराव लेकर गहरी सांस लेते हैं तो सच में क्या होता है?
हम इस दौड़ती भागती जिंदगी के बीच रुकते हैं। दिमाग को, दिल को और आत्मा को एक ही जगह एक ही क्षण में लाकर खड़ा करते हैं। यही है माइंडफुलनेस। जब आप अपनी सांस को महसूस करते हो। जैसे वह आपकी नाक से गुजर रही है, सीने में फैल रही है। फिर धीरे-धीरे बाहर निकल रही है। तो आप अब और भविष्य की चिंता से बाहर आ जाते हो। आप अभी में आ जाते हो। यहीं पर इसी पल में दुनिया आपको सिखाती है। तेज सोचो, आगे की सोचो, चिंता करो ताकि तुम तैयार रहो।
लेकिन यहाँ आप रुको, देखो और शांति से सांस लो। समाधान वहां नहीं ,यहां है।
चिंता एक ऐसे बीज की तरह है जिसे आप कल की आशंका से सींचते हो। लेकिन माइंडफुलनेस एक ऐसा सूरज है जो उस बीज को जलाकर खत्म कर देता है। आप कभी चिंता से मुक्त नहीं हो सकते जब तक तुम चिंता को पकड़ कर बैठे हो। लेकिन अगर आप सांस पर ध्यान दो अभी में लौट आओ तो चिंता खुद ही पीछे रह जाती है।
हमारे दिमाग में हर दिन 60 हजार से ज्यादा विचार आते हैं। इनमें से ज्यादातर दोहराए हुए और नकारात्मक होते हैं। जब हम ध्यान नहीं देते तब दिमाग अपना ही खेल खेलता है। अगर यह हो गया तो क्या? अगर वह बिगड़ गया तो क्या? मैं असफल हो गया तो क्या? और यह सब क्या होगा कि कहानियां हमें क्या है से दूर ले जाती है। लेकिन जब आप अपनी सांस पर ध्यान देते हो तो दिमाग को एक लंगर मिल जाता है। जैसे समुंदर की लहरों में डगमगाती नाव को एक गहरी रस्सी से किनारे बांध दिया गया हो। मनोविज्ञान भी यही कहता है माइंडफुलनेस से हमारा एमगडाला यानी वह हिस्सा जो डर और घबराहट को बढ़ाता है शांत हो जाता है। कॉर्टेक्स जो सोचने, समझने और निर्णय लेने वाला हिस्सा है वह सक्रिय हो जाता है। मतलब ध्यान, गहरी सांसे और वर्तमान में जीना सिर्फ एक आध्यात्मिक बात नहीं बल्कि वैज्ञानिक इलाज है चिंता का।
अब बात करते हैं उस फर्क की जो एक सामान्य इंसान और जागरूक इंसान के बीच होता है।
सामान्य व्यक्ति जब चिंता करता है तो वह उसे पकड़ लेता है। सोचता है यह सही है। यह मेरी सच्चाई है। पर जागरूक व्यक्ति वो अपनी चिंता को आता हुआ देखता है और बस उसे गुजर जाने देता है। वो कहता है मैं चिंता नहीं हूं। मैं सिर्फ देख रहा हूं और यह देखने की शक्ति मिलती है ध्यान से। ध्यान यानी खुद को देखना बिना जजमेंट के। सांस को देखना, सोचों को देखना, शरीर की हर हरकत को देखना। फर्क यह नहीं है कि आप सोचते हो या नहीं। फर्क यह है कि आप उन सोचों में बह जाते हो या उन्हें बस गुजरते हुए देखते हो। अगर आप हर दिन सिर्फ 10 मिनट, सिर्फ 10 मिनट चुपचाप बैठकर अपनी सांस पर ध्यान दें तो आपकी सोच का ढांचा बदल सकता है।
चिंता जो पहले पहाड़ लगती थी, अब बादल की तरह हल्की लगने लगेगी। आती है, जाती है। सांस ही जीवन है। आप हर पल जिस चीज को लेते हो और छोड़ते हो, वही तो सबसे सच्ची चीज है आपके पास। तो क्यों ना उसी को अपना ध्यान बना लिया जाए। जब भी मन डगमगाए, घबराए, बस कुछ गहरी सांसे लो। आंखें बंद करो और खुद से कहो मैं यहां हूं, मैं अभी हूं और सब ठीक है। और यहीं से शुरू होती है वह आंतरिक शांति। जो ना कोई शब्द दे सकता है, ना कोई किताब। वह बस आपकी सांसों में है। बस वर्तमान में है।

तो अगली बार जब चिंता आने लगे तो भागो मत। बस रुक जाओ। सांस लो और उस चिंता को गुजरते हुए देखो। क्योंकि जैसे ही आप वर्तमान में लौटते हैं, आप चिंता से आजाद हो जाते हैं। और यही पहला कदम है एक शांत जीवन की ओर। और जब आप यह कर पाते हैं, तो अगली शक्ति अपने आप पनपने लगती है धैर्य की शक्ति। कभी आपने सोचा है कि हम ज्यादातर परेशानियों किन बातों को लेकर करते हैं जिन्हें हम बदल नहीं सकते। दूसरों का व्यवहार, दुनिया की सोच, किसी का साथ छोड़ जाना, मौसम, समय, बीता हुआ कल, आने वाला कल यह सब हमारे हाथ में नहीं है।
फिर भी हम इन चीजों को कसकर पकड़ लेते हैं। मानो पकड़ लेंगे तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन यही पकड़ हमारी सबसे बड़ी पीड़ा बन जाती है। गौतम बुद्ध ने एक बार कहा था, दुख इस बात से नहीं आता कि जीवन में क्या हुआ? दुख इस बात से आता है कि तुम उसे छोड़ नहीं पाए। अब कल्पना कीजिए आप हाथ में एक जलती हुई रस्सी पकड़ कर खड़े हैं। जैसे-जैसे वक्त बीतता है वो रस्सी आपकी त्वचा को जला रही है।
फिर भी आप उसे छोड़ते नहीं। क्यों?
क्योंकि आपको लगता है अगर मैंने इसे छोड़ दिया तो शायद मैं हार जाऊंगा। यही तो है हमारा जीवन। हम बीते रिश्तों, अपनों की बातों, खोई हुई इज्जत या किसी की प्रतिक्रिया को इतना कसकर पकड़ कर रखते हैं कि वह हमें अंदर ही अंदर जलाते रहते हैं। और फिर हम कहते हैं मैं दुखी हूं, परेशान हूं, तनाव में हूं। सच तो यह है कि दुख ने हमें नहीं पकड़ा। हमने दुख को पकड़ रखा है।
हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे हिसाब से चले।
लेकिन क्या सूरज आपके कहने से उगता है?
क्या बारिश आपके मन से गिरती है?
क्या कोई इंसान आपकी इच्छा से बदलता है?
फिर भी हम बार-बार वही गलती करते हैं। काश वह ऐसा करता, काश वैसा ना हुआ होता, काश वो लौट आता। काश मैं उसे समझा पाता।
लेकिन जीवन काश से नहीं चलता। जीवन अब क्या से चलता है।
जो तुम्हारे नियंत्रण में है वो है तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारी सोच, तुम्हारा दृष्टिकोण, बाकी सब। जैसे कि किसी की राय, किसी की नफरत या किसी का रवैया, वह तुम्हारे बस में नहीं है। और जो तुम्हारे बस में नहीं है उसे पकड़ कर क्यों बैठना? यहां एक छोटा सा उदाहरण समझो। एक लड़का सुबह-सुबह मंदिर जा रहा था। रास्ते में एक आदमी ने उसे धक्का दे दिया। वो लड़का पलटा गुस्से से भरा था। फिर उसने देखा वो आदमी अंधा था। तुरंत उसका गुस्सा गायब हो गया। अब सोचो क्या बदला? धक्का वहीं था। चोट वहीं थी। लेकिन नजरिया बदलते ही प्रतिक्रिया बदल गई।
अब सोचो क्या हर बार जिंदगी में जो तुम्हें चोट दे रहा है वह वाकई जानबूझकर दे रहा है या शायद वह भी किसी अंधेपन से जूझ रहा है। जैसे ही तुम यह समझ जाते हो कि सामने वाला तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है और उसे बदलना तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हारा मन हल्का हो जाता है। मनोविज्ञान भी यही कहता है जब इंसान उन चीजों को छोड़ना सीखता है जो उसके बस में नहीं तो एंग्जायटी लेवल अपने आप गिर जाता है। क्योंकि अब दिमाग एक ऐसी लड़ाई नहीं लड़ रहा जो वह जीत ही नहीं सकता।
अब एक साधारण व्यक्ति और एक जागरूक व्यक्ति में फर्क देखो। साधारण व्यक्ति जब अस्वीकार या असफलता का सामना करता है तो वह जोर लगाता है। उसे बदलने की कोशिश करता है या बार-बार सोचकर खुद को जलाता है। लेकिन एक जागरूक व्यक्ति जानता है। मुझे जो करना था मैंने किया। अब जो मेरे हाथ में नहीं है वो मेरे दिमाग में भी नहीं होना चाहिए। उसकी ऊर्जा उसी चीज में लगती है जो उसके वश में है। और यही सीख जीवन बदल देती है। क्योंकि जब आप छोड़ना सीखते हैं तो आप खोते नहीं हो बल्कि खुद को वापस पाते हो। छोड़ना कमजोरी नहीं है बल्कि सबसे बड़ा साहस है, क्योंकि पकड़ना आसान है पर जाने देना बहुत ताकत मांगता है।
तो अगली बार जब कोई बात, कोई इंसान, कोई परिस्थिति आपके बस से बाहर हो तो खुद से बस एक सवाल पूछिए। क्या यह मेरे नियंत्रण में है? अगर जवाब है नहीं तो बस छोड़ दो। शांति वहीं से शुरू होती है। याद रखो हमें हवा को नहीं रोकना है। बस अपनी पतंग को हवा के साथ उड़ना सिखाना है। और जैसे ही हम यह कला सीख जाते हैं, हम अगली शक्ति की ओर बढ़ते हैं जो है धैर्य, उस पर नियंत्रण और सही समय की प्रतीक्षा। और यही हमें अगली गहराई तक ले जाएगा।
कभी सोचा है कि भीड़ में सबसे अलग कौन लगता है? वो जो चिल्लाता है वो जो बोलता रहता है या वो जो चुपचाप एक कोने में बैठा है शांत स्थिर और रहस्यमय दुनिया का सबसे गहरा आकर्षण है रहस्य और रहस्य पैदा होता है शांति से आज के इस शोरगुल वाले युग में जहां हर कोई बोल रहा है चिल्ला रहा है सोशल मीडिया पर अपनी राय ढेल रहा है वहां एक ऐसा इंसान जो चुप है बस देख रहा है सुन रहा है वो सबसे ज्यादा आकर्षक बन जाता है।
क्यों?………. क्योंकि हम नहीं जानते कि वह क्या सोच रहा है। उसकी आंखें क्या छुपा रही हैं। वह क्या कहेगा या कहेगा भी या नहीं। उसकी चुप्पी ही उसकी ताकत है। कम बोलने वाला इंसान जब बोलता है तो लोग ध्यान से सुनते हैं क्योंकि उनकी बातों में वजन होता है। वह हर समय खुद को जाहिर नहीं करता। इसलिए जब करता है तो असर छोड़ता है।
अब एक उदाहरण देखिए। अगर आप किसी को पहली ही मुलाकात में सब कुछ बता दो अपने राज, अपनी सोच, अपनी योजनाएं तो अगला इंसान आपकी कदर करना बंद कर देता है।
क्योंकि इंसान को जो चीज मिल जाए वह उसे मूल्यहीन लगने लगती है। लेकिन अगर आप थोड़ा रहस्य बनाए रखो। थोड़ा शांत रहो। अपनी बातों को फिल्टर करके कहो तो लोग सोचते हैं इस इंसान में कुछ खास है क्योंकि शोर तो हर जगह है पर शांति सिर्फ गहराई में मिलती है।
मनोविज्ञान भी कहता है जो व्यक्ति बार-बार खुद को साबित करने की कोशिश नहीं करता वह अंदर से मजबूत होता है क्योंकि उसे खुद पर भरोसा होता है और वही भरोसा लोगों को आकर्षित करता है। जो शांत होता है, वह दुनिया को देख रहा होता है, समझ रहा होता है, सीख रहा होता है। वह दूसरों की बातें बीच में नहीं काटता क्योंकि उसे अपनी बारी का इंतजार करना आता है। वह हर प्रतिक्रिया नहीं देता क्योंकि उसे हर लड़ाई लड़नी जरूरी नहीं लगती और यहीं से पैदा होता है उसका रहस्य, उसका वजन, उसकी चुंबकीय शक्ति। शांत व्यक्ति किसी की नजरों में डरावना भी लगता है क्योंकि लोग उसकी शांति से असहज हो जाते हैं। क्योंकि हम सभी आदि हो चुके हैं शोर के।
तो जब कोई सामने बैठा हो कुछ ना कहे तो दिमाग उसे पढ़ने की कोशिश करता है और जितना ज्यादा आप किसी को समझने की कोशिश करते हो उतना ज्यादा आप उसकी तरफ खींचते चले जाते हो। यही तो होता है रहस्य का जादू। अब यह मत समझो कि शांत होने का मतलब है कमजोर होना। नहीं बल्कि शांत व्यक्ति के पास असंख्य विचार होते हैं। लेकिन वह जानता है कि किसे जाहिर करना है और कब। कम बोलना यानी बुद्धिमानी। क्योंकि शब्दों में बहुत ताकत होती है और जो उस ताकत का सही इस्तेमाल जानता है वही असली ताकतवर होता है। असली नेता वही होता है जो कम बोले पर जब बोले तो भीड़ चुप हो जाए। असली योद्धा वही होता है जो तलवार तभी उठाए जब जरूरत हो। और असली इंसान वही होता है जो अपनी शांति से अपने रहस्य से दुनिया को आकर्षित करता है।
तो जब आप किसी बातचीत में हो तो बोलने की जल्दी मत करो। रुको सुनो सोचो फिर कहो। क्योंकि जिस इंसान के पास सब्र है, वह सबसे ऊंचा सुनाई देता है चुप रहकर भी। और जब आप खुद को चुप रखने लगते हो, तो आप दूसरों की बातें सुनना शुरू करते हो। फिर दुनिया धीरे-धीरे आपकी तरफ खींचती है क्योंकि रहस्य में जादू होता है और यह जादू हर इंसान के अंदर हो सकता है। बस शांति के रास्ते चलो, भीड़ से अलग चलो, कम कहो, गहराई से कहो और फिर अगली शक्ति का द्वार खुद खुलेगा। धैर्य और प्रतिक्रिया में अंतर जो एक शांत दिमाग को और भी मजबूत बना देता है।
अंतिम संदेश (Conclusion)-
Stress jyada ho to kya kare – इसका जवाब बहुत बड़ा नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे कदमों में छिपा है। जब भी आपको लगे कि तनाव बढ़ रहा है, तो गहरी साँस लें, थोड़ी देर ध्यान करें, या बस अपने मनपसंद काम में समय बिताएँ। याद रखिए, स्ट्रेस को नज़रअंदाज़ करना समाधान नहीं है। उसे पहचानना और धीरे-धीरे कम करना ही असली राहत है।
जीवन में संतुलन बनाना ही सबसे बड़ा उपाय है। काम और आराम दोनों को बराबर महत्व दें। अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग और meditation को अपनाएँ, और अपने मन को खुश रखने के लिए दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताएँ।
तनाव को कम करने का सफर आसान नहीं होता, लेकिन यह सफर आपको एक बेहतर इंसान बनाता है। हर दिन छोटे-छोटे बदलाव करके आप अपने जीवन को हल्का, शांत और खुशहाल बना सकते हैं।
तो दोस्तों, डर से लड़ने का कोई मंत्र नहीं है। बस खुद पर भरोसा रखो। सांस लो और एक बात याद रखो डर भागता है जब तुम उसके पीछे भागना छोड़ देते हो।चिंता को तो हमने बोल ही दिया- अब तू घर जा, अब हम ध्यान लगाते हैं।
अगर आप मुस्कुरा रहे हो तो समझ लो कि डर भी आपसे डर गया है। तो अगर यह ब्लॉग /लेख पढ़ कर आपको थोड़ा सा भी अच्छा लगा है, तो My Dear Friend कमेंट कर दो क्योंकि ऐसा करने से आपके अंदर एक हिम्मत आएगी कि अब मैंने चिंता (Stress) और डर के विरुद्ध अभियान छेद दिया है, स्टेप लेना शुरू कर दिया है।
अगर आपका कोई दोस्त, मित्र, रिस्तेदार, भाई बंधू , आपका सहयोगी या और कोई भी जिसे आप दिल से चाहते है और जो कि हर वक्त चिंता करता रहता है, उसे शेयर अवश्य ही करे। क्योंकि अगर आप किसी का अच्छा करेंगे तो ब्रह्माण्ड/ ईश्वर आपके साथ भी अच्छा ही करेगा। आपके पास वही आएगा जो कि आप दुसरो को देंगे। यही ब्रह्माण्ड/ ईश्वर का अभी न बदलने वाला नियम है।
धन्यवाद!
आपका दोस्त
Dr. Haire (डॉ. हैरी)
Life, Career & Business Success Coach

bahut hi badhia jankari hai. dhanwad.
Thanks a lot.
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It’s very good information to get rid of stress in hindi.
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Superb, bilkul sahi aour achhi jaankari hai. mujhe personally bahut labh hua hai.
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sach me bahut hi informative hai.
bhai maja aa gaya. meri chinta sach me gayab hone lagi.
Bhai Thanks a lot.
chinta mukti ke liye, bahut hi labhdayak likha hai. thankyou.